तुम लौट आओ डॉक्टर दिवाकर गोयल की कविताओं का संकलन है। दिवाकर जी वर्तमान में बंस्थाली विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट अनुसंधान पर्यवेक्षक के रूप में कार्यरत हैं, दिवाकर जी अतिथि फैकल्टी के रूप में अन्य संस्थानों जैसे LBSNAA(आईएएस ट्रेनिंग ), आईआईएम रायपुर एवं रांची, आईआईटी खड़गपुर एवं दिल्ली में अपना योगदान प्रदान करते रहते हैं। इसके अालवा IIPA में अनुसंधान परीक्षक और संकाय(Research examiner and faculty) तथा ACI एशिया पैसिफिक हांग कांग में एचआर स्टैंडिंग समिति के सदस्य भी हैं। दिवाकर जी को कुछ प्रख्यात व्यक्तियों के द्वारा उपनाम प्रदत्त किए गए हैं जैसे दिवाकर एक खुशफिक्रशायर( कैफ़ी आज़मी), खुदादाद सलाहियत का शायर दिवाकर( नौसद अल), दर्द का सौदागर दिवाकर( जावेद अख्तर), बाशौरे जहान का शायर दिवाकर(नीदफजली), फिक्रो जज्बे का शायर दिवाकर( साबिर दत्त) ,खोए हुए सोए हुए लम्हों का शायर दिवाकर( सलमा सिद्दकी), A poet with pure heart( Sunil gangopadhyay), A bureacrate with sensitivity of a poet and unique attraction( Shabana Azmi)दिवाकर जी ने इससे पहले भी कई रचनाएं लिखी थी जिसमे से एक कहानी गिरती दीवारों के बीतथा दो कविताओं की किताब सिसकते अरमान और मेरे बचपन का चांद  था।

तुम लौट आओ किताब का मुख्य विषय ज़िंदगी है। ज़िंदगी के अनेक लम्हों को समेटे उन कविताओं का संगम है जिसमें प्रेम, त्याग, जीवन की उत्सुकता, जीवन की नीरसता, जीवन के हर वो पल जो लेखक ने देखे हैं, अनुभव किए हैं सभी समाहित है। ज़िन्दगी में हम सभी उन अनुभवों से कभी न कभी गुजरते जरूर है जो लेखक ने अपनी कविताओं के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। दिवाकर जी ने अपने काम में कामयाबी के साथ साथ अपनी लेखनी में भी कामयाबी हासिल कर ली है। कोई किताब तभी सफल कहलाती है जब उनमें लिखे अल्फ़ाज़ पाठकों के दिल को छू जाए, पाठकों को उनके अतीत, वर्तमान या भविष्य की एक छवि दिखला दे। दिवाकर जी की कविताओं ने भी उन्हीं अनछुए पहलुओं को स्पर्श करने की कोशिश की है जो पाठकों के मन के किसी कोने में बिखरे पड़े है। दिवाकर की जी कविताएं सिर्फ कविताएं ना होकर अपने अंदर अनेकों संदेशों का उद्गार करती हैं।

दिवाकर जी की किताब से रस सुगंध जीवन, मैं हवा हूं जैसी कविताएं प्रकृति का बखूबी वर्णन करती है। प्रकृति में उपस्थित पुष्प के जीवन का यथार्थ चित्रण कविता में प्रस्तुत होता है, पुष्प जो रस से भरी हुई तितलियों और भौरों को आकर्षित करती हैं, जब वही बूढ़ी हो जाती है तब उसकी पहचान खो जाती है। इसी तरह हमारे जीवन में भी जब तक मनुष्य उत्सुकता, चंचलता और प्रेम के रस से भरा होता है, तभी वह अपनी पहचान बना  पत है। इस कविता में एक अहम संदेश ये भी हैं कि किसी को खुशियां देने में जिस आनंद की अनुभूति होती है वैसा आनंद किसी और कार्य से अनुभव नहीं किया जा सकता। इसी तरह से नहीं देखा कविता भी हमारे जीवन को सुगम बनाने का संदेश देती है, जिससे कठिनाइयों में भी जीवन के परम आनन्द को प्राप्त करने का संदेश है।

तुम लौट आओ किताब में लेखक ने शुद्ध एवं परिपक्व हिंदी भाषा का प्रयोग बड़ी सहजता से किया है। शब्दों की क्लिष्टता के बजाय लेखक ने सरलता पर विशेष ध्यान दिया है। अपनी भावनाओं को तोड मरोड़ कर पेश करने की बजाय सरल व सीधे अल्फाजों में प्रस्तुत किया है। इस किताब में अनेक रसों का भी प्रयोग बखूबी किया गया है। मन पर लिखा नाम तुम्हारा, हम दोनों इन कविताओं में प्रेम झलकता है , याद का आना और तड़पना, तुम लौट आओ इन कविताओं में विरह की छाप दिखाई पड़ती है। प्रेम और विरह के अनुभव से श्रृंगार रस की प्रस्तुति झलकती है।  कुछ वात्सल्य से भरी कविताएं जैसे और वो बचपन हमारी  बाल्यावस्था को जीवंत कर देती हैमै हवा हूं, रस सुगंध जीवन में प्रकृतिवादी गुण प्रदर्शित होती है

इस किताब में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी ही बारीकी से लिखा गया है। जैसे देश की स्थिति पर लिखी गई कविताएं आतंक से आतंक की मौत  जो देश की बेबसी के साथ साथ देशवासियों के देशप्रेम को दिखाती है, फिर देबोला में देश की हालत को प्रांतीय विचारधारा, ऊंचनीच का भाव इन कसौटियों में रख कर तौलने का प्रयास करता है और देश की उस तस्वीर को परिलक्षित करता है जिसमें देश की अनेकता दिखाई पड़ती है, इस कविता में इस अनेकता को राष्ट्रीय एकता में बदलने का और देश को प्रगतिशील बनाने का संदेश दिया गया है। इसके अलावा दिवाकर जी ने अपने लेखन में जीवन में प्रेम, नीरसता का स्थान एवं समय के महत्व पर भी जोर दिया है

तुम लौट आओ किताब को यदि एक संपूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति कहा जाए तो शायद यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। कविताओं कि शुरुवात में थोड़ी बेचैनी और उलझन प्रतीत होती है जो एक पाठक को उस लेखन में डूबा देने का एक अद्भुत और रोचक प्रयास है और यह प्रयास दिवाकर जी का सफल भी सिद्ध हो रहा है। इस किताब में मेरे लिए प्रेरणा दायक कविताओं में से फिर देबोला, कल आज और कल, ज़िन्दगी को तलाशती कश्ती है जिसने मेरे जीवन के उन किनारों को स्पर्श किया जिन किनारों से में अक्सर लौट आती थी।

Ratings:
4.5/5

Author Name: Dr. Dewakar Goel
Book Title:  Tum Laut Aao
Publisher: Evincepub Publishing (22 July 2019)
Review By:  Kalpna  at Criticspace

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